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स्वप्न

स्वप्न एक स्वप्न नशा बन गया। सालों पहले इन आँखों ने पिया था। आज बंद आँखों ने चख लिया। पंख सा हल्का ये शरीर आकाश में तैरता रहा। पद्म कुसुम सा क्षीरसागर में डोलता रहा। आज ओष्ठ पत्र पर शिशिर के कुछ बूंद गिरे। नुपुर कि ध्वनि क्षितिज से सुनाई दी। मैंने तो तरकश में बिष बाण रखे थे। आज अनायास ही सहस्र कुसुम दल में बदल गई। - साहेब राम टुडू

सुर

बहुत दिन पहले एक संगीत मैंने खो दिया था हड्डपा और मोहनजोदड़ो  के सभ्यता में... आज उसे मैंने फिर से पाया है किन्तु उस संगीत का सुर मैं भूल गया हूँ। इस संगीत का सुर न खोज कर आर्य और अनार्य के बीच लड़ाई शुरू हो गई - ये मेरा है ! ये मेरा है ! ये मेरा है ! -साहेबराम टुडू 

शांत प्रशांत महासागर

लोग कभी मरना नहीं चाहता , जवान कभी बुड्ढा नहीं होना चाहता। उसी तरह समय भी अतीत में नहीं वर्तमान बनकर वापस आता है। जो शांत बैठा समुद्र है वो फिर से मंथन करने बैठता है। लोग अचंभित होतें हैं कि शांत प्रशांत महासागर आज हिमालय की तरह खड़ी होकर आकाश क्यों ढँक रही है ?

पत्थर

पत्थर ने कभी नहीं सोचा , वो भगवान बन जाएगा। लोग उसमे सर टिकाएंगे या अपना सर फोड़ डालेंगे। आग निकालेंगे या बाग सजायेंगे। वो हमेशा ही पत्थर रहा , सब बना बनाया है इन्सान का। उसने चाहा तो छत पर लगाया उसने चाहा तो चौखट पर लगाया। कभी बुत तो कभी ताबूत  बनाया। हाँ, पत्थर ने इन्सान को आश्रय और आहार जरुर दिया। शायद इसी की कृतज्ञता आज भी वो अदा कर रहा है। 

पाप प्रच्छालन

लोग पाप धुलने के लिए गंगा में जाने कितने बार डूबकी लगाते हैं ? पर पाप कभी  धुलता ही नहीं। शायद सर्फ़ एक्सेल से धुल जाई। गंगा मुस्कुराती और कहती है - रे मुरख ! मुझे पता है तू घर जाकर फिर से नहाने वाला है तो फिर क्यों यहाँ ढोंग करता है। _साहेबराम टुडू 

६६ वर्ष

६६ वर्ष हम नंगे सोये, भूखे और प्यासे रहे। मेरी कोख में पलते गर्भस्त शिशु  पैदा होने से पहले मर गया। कोई देबी माँ नहीं आई। आज एक कहाँ से दयामयी माँ प्रकट हुई ? मेरे हाथ में एक रुपया  डाल  के चली गयी। बोली कल मैं फिर आऊँगी इसी तरह तब तक के लिए हाथ फैलाये खड़ी  रहना। मैं गर्मी में , बरसात में, ठिठुरते ठंड में खड़ी रही कि वो करुणामयी माँ दया की बारिश करेगी आज वो आई। जो रुपया उसने कल मेरे हाथ में दिए थे वापस लेके चली गई। -साहेब राम टुडू

मैं कौन हूँ ?

हे भगवान ! बताओ मैं कौन हूँ ? क्या मैं बिरसा हूँ ! क्या मैं सिद्धो हूँ ! क्या मैं कान्हु हूँ ! या फिर मैं तिलका हूँ ! बताओ मैं कौन हूँ ? क्योंकि मेरे अन्दर भी ऐसे ही आग धधक  रही है। -साहेब राम टुडू