Friday, April 11, 2014

निशा

जब वक्त निशा की आती है
आसमां में सितारे  दीखते हैं।  
हम तो टुकड़े  चाँद हैं 
उस निशा में सैर करते है। 

खामोश है ये नाव मेरी 
 चुपके चुपके चलती है 
अपना एक टुकड़ा पाने को 
जाने कितने निशाएँ आती है।  

Tuesday, April 8, 2014

धड़कन

एक जिन्दा मछली सी होती है धड़कन
हल्की सी  साँस  लेती हुई कुछ गुब्बारें छोड़ती हुई।


Friday, April 4, 2014

नाम

कापते हैं हाथ मेरे
नाम अब अपना लिखते हुए।
कापते हैं हाथ मेरे
 नाम अब तेरे लिखते हुए ।।

कुछ खुले से पन्ने थे,
कुछ शब्द बिखरे पड़े थे।
कुछ शब्द मैंने पढ़े ,
कुछ शब्द तुमने चुराए।

कांपते हैं  ओठ मेरे
वो शब्द कहते हुए।
कापते हैं ओठ मेरे
नाम अब तेरे लेते हुए।।

- साहेब राम टुडू